ध्यान पद्धति में सामूहिक चेतना के क्या मायने हैं?

 


ध्यान पद्धति में सामूहिक चेतना के क्या मायने हैं?

जब हम शरीर की चेतना से ऊपर उठकर दूसरों की मदद करने के लिए अग्रसर रहने लगते हैं या दूसरों के कल्याण की बात सोचने लगते हैं, तब हम उस अवस्था में सामूहिक चेतना में प्रवेश करने लगते हैं। इस अवस्था तक पहुंचने का एक मात्र रास्ता शिवयोग में बताया गया है। साधक जब शिवयोग की सिद्ध ध्यान-साधनाओं को अपने जीवन में अपनाकर अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा लेता है, तभी वह ब्रह्माण्ड के रहस्यों को अच्छे से समझ पाता है। तब उस अवस्था में उसे ज्ञात होता है कि आत्मा इस सृष्टि में बार-बार जन्म क्यों लेती है। हमारा कौन सा लक्ष्य अधूरा रह गया है, जिसकी पूर्ति के लिए हमारी आत्मा को बार-बार इस पृथ्वी पर आना पड़ रहा है। जिसे हम साधारण भाषा में कालचक्र भी कहते हैं। इस कालचक्र से मुक्ति के लिए ही साधक को शिवयोग की ध्यान-साधना को अपने जीवन में स्वीकार करना चाहिए। जो साधक ऐसा करके अपनी सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा लेता है और कर्म के बंधन से स्वयं को मुक्त कर लेता है, तब उसे इस कालचक्र से मुक्त होने का मार्ग स्वतः ही दिख जाता है।

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